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मुक्तक:– मन के पन्ने भावों  की  नगरी  में  निशदिन

मुक्तक:– मन के पन्ने

भावों  की  नगरी  में  निशदिन, अंगारे  दहके।
मन के  पन्ने  कुतर  रहा है, वक्त  स्वयं चलके।
आशाओं  की  गठरी  बांधे, घूमें  नित्य  पवन।
अंतस में चुपचाप दामिनी, घुट घुट के चमके॥

©दिनेश कुशभुवनपुरी
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