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ग़ज़ल बहर -1222. 1222. 1222. 1222 तुम्हे



ग़ज़ल 
बहर -1222.   1222.   1222.   1222

तुम्हें जो गर मुहब्बत थी जताने ही चले आते,
कटे कैसे  तुम्हारे दिन बताने ही चले आते ll

खुशी हमको हुई ये जान आए तुम शहर मेरे 
हँसाना गर नहीं मुमकिन सताने ही चले आते ll

बड़ा ही प्यार दिखता था निगाहों में कभी तेरे,
वही फिर प्यार लेकर तुम रिझाने ही चले आते ll

कहीं तो कुछ बचा होगा हमारे दरमिया अब भी,
उन्हीं वादे वफ़ा को फिर निभाने ही चले आते ll

शिकायत मैं करूँ कैसे रहा जब हक नहीं तुम पर,
तुम्हें भी दर्द होता है दिखाने ही चले आते ll

मिली रुसवाइयाँ तुमको, हुए हम भी कहाँ पूरे,
गिले शिकवे दिलों में ले सुनाने ही चले आते ll
मंजू कुशवाहा ✍️ 
नोएडा उत्तरप्रदेश

©Manju kushwaha
  ग़ज़ल

ग़ज़ल #Poetry

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